Wednesday, February 12, 2014

एक-एक क़तरे का...

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब;
ख़ून-ए-जिगर वदीअत-ए-मिज़गान-ए-यार था;

अब मैं हूँ और मातम-ए-यक शहर-ए-आरज़ू;
तोड़ा जो तू ने आईना तिम्सालदार था;

गलियों में मेरी नाश को खेंचे फिरो कि मैं;
जाँ दाद-ए-हवा-ए-सर-ए-रहगुज़ार था;

मौज-ए-सराब-ए-दश्त-ए-वफ़ा का न पूछ हाल;
हर ज़र्रा मिस्ले-जौहरे-तेग़ आबदार था;

कम जानते थे हम भी ग़म-ए-इश्क़ को पर अब;
देखा तो कम हुए पे ग़म-ए-रोज़गार था।
Mirza Ghalib

No comments:

Post a Comment